Mahabharat Essay Writing Competition Winning Essay (Part 4)
We organized an Essay Writing Competition on the theme "Lessons I learnt from the Mahabharat," we got amazing responses and our winners depicted through their excellent writing skills the lessons they have learnt from this timeless epic. So here we present to you some of the best essays penned down by our writers.
Our Winner under Hindi Category -
Minal Kiran Bakshi
महाभारत की अनमोल देन
"मैं समय हूँ."* दूरदर्शन पर ये स्वरगुंजन मात्र महाभारत का आरंभ नहीं, गंभीर चेतावनी भरा जीवनदर्शन होता था l वास्तव में महाभारत केवल संग्रामकथा नहीं, कर्तव्य,ज्ञान -अज्ञान,न्याय- अन्याय,महत्वाकांक्षा के बीच होने वाले शाश्वत संघर्ष का अमर धर्मग्रंथ है। धर्म का मार्ग कठिन अवश्य है, पर अंततः सत्य ,न्यायपूर्ण और स्थायी है l इसके उद्गात विचार और संस्कार मानव का दृष्टिकोंन बदलने शक्ति रखते है l
अधर्म कभी अचानक जन्म नहीं लेता,अनुचित व्यवहार,अपमान,अन्याय, कठोर वचन,तीक्ष्ण शब्द ,मौन स्वीकृतियां,गलत संगत , बेवज़ह उम्मीदें ,अयोग्य निर्णयों के कारण सत्य से किए गए समझौतों की नींव पर धीरे-धीरे पनपता है l महाभारत के प्रत्येक पात्र,चाहे वो नकारात्मक ही क्यों ना हो,गहरा संदेश देते हैl शकुनि के छल और प्रतिशोध की विनाशकारी शक्ति हो,या धृतराष्ट्र के पुत्रमोह का दुष्परिणाम हो,महाभारत सिर्फ जय पराजय की इतिहास नहीं, बल्कि सही और गलत के नतीजों का ज्ञानदायक अनुपम विश्वविद्यालय है l
विभिन्न परिस्थितियों जन्मे कौरव और पांडव केवल दो वंश नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर बसे अधर्म और धर्म के प्रतीक हैं। कौरवों के दुर्गुणों ने विनाश मंजर दिखाया ,जबकि पांडवों के सद्गुणों ने विजयपताका फहराई ।
दुर्योधन ने शक्ति और अधिकार का दुरुपयोग किया,दानशुरू कर्ण ने दैवी कवचकुंडलधारी होते हुए भी अधर्म का साथ देकर गलत संगति के दुष्परिणाम दिखाऐं,कुंति द्वारा कर्ण के जन्म का रहस्य छिपाना, युधिष्ठिर द्वारा द्यूतक्रीड़ा को स्वीकार करना,ये सभी बताते हैं कि कैसे गलत निर्णय दूरगामी परिणाम ला सकता हैl सच्चा स्नेह आँखो पर पट्टी बांधकर नहीं निभाया जाता,अपने प्रियंजन के अनुचित व्यवहार और गलतियों को दृढ़ता से धर्ममार्ग पर लाना ही जरूरी हैं।
शब्द बाण की थरारकता कितनी भयानक हो सकती ये मयसभा में उपहासपूर्ण वाणी से दुर्योधन का हुआ अपमान जिसने प्रतिशोध की ज्वाला को और भड़का दिया, जिसका परिणाम द्यूतसभा में भरे दरबार में द्रौपदी को भीषण अपमान के रूप में सहना पड़ा । उस समय भीष्म और द्रोण जैसे कई सम्मानित बुजुर्गों ने घोर अन्याय को मौन समर्थन देकर अधर्म सिद्ध किया। सच्चाई और मानवीय गरिमानुसार नारी का सम्मान ही सभ्यता और धर्म की प्रथम पहचान है।
*ll श्री कृष्णम् वंदे जगतगुरुम् ll*
महाभारत की सबसे अमूल्य देन स्वयं पूर्ण पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण द्वारा प्रदत्त श्रीमद्भगवद्गीता है, जिसमें महाभारत का संपूर्ण सार निहित है। जिसके अमृतबोल पार्थ सहित समस्त मानव कल्याण हेतु है और सदैव रहेंगे l वीर अर्जुन का कर्तव्य को लेकर मन में द्वंद्व उत्पन्न होना स्वाभाविक था ,और उसने भी जिज्ञासु बनकर उचित मार्गदर्शन ग्रहण कर धर्मानुसार कर्म करके श्रेष्ठत्व प्राप्त किया।
"कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥"
कर्मफल की चिंता किए बिना अपने कर्तव्य का निष्ठापूर्वक पालन करना ही सच्चा धर्म हैं। यही जीवन रूपी कुरुक्षेत्र के संग्राम में आज भी हमारे आचार, विचार,निर्णय और कर्म जीवित है, किंतु देखना ये है कि हम अपने भीतर के पांडव को चुनते हैं या कौरव l
कई कटु अनुभव होते हुए भी लाक्षागृह और अज्ञातवास के प्रसंगो ने बताया जीवन मे कई बार शक्ति से ज्यादा युक्ति,धैर्य और समयसूचकता आवश्यक हैं।
प्रसिद्ध महारथियो के अतिरिक्त महाभारत में अनेक अनसुने,अनकहे किरदार भी थे जैसे की विदुर, विकर्ण,युयुत्सु,संजय सात्यकि,उत्तरा जिन्होंने सत्यधर्म और कर्मनिष्ठा की मिसालें दी हैं,पर कभी प्रसिद्धि के मोहताज नहीं बने।
महर्षि वेदव्यास ने महाभारत के माध्यम से मानव-स्वभाव का अनोखा दर्पण दिखाकर आने वाली पीढ़ियों को सतर्क किया है, ताकि वे त्रुटियों और आदर्शों से जीवन-मूल्य सीख सकें। धर्म-अधर्म,सत्य-असत्य दोनों मार्गों को परखकर किया गया योग्य चयन ही हमारे चरित्र और भाग्य को उजागर करता है।
मेरा विनम्र अनुरोध है कि अपनी संस्कृति की इस अजरामर धरोहर का सभी अध्ययन अवश्य करें l मानवी जीवन के विश्वकोश स्वरूप महाभारत ग्रंथ की गूढ़ता को समझें और स्वयं भी युग-परिवर्तन के सहभागी बनकर भारत की 'जगतगुरु' की गौरवशाली परंपरा को पुनः सार्थक करें l
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